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आरके श्रीवास्तव की शक्तियां रोकने पर भोलानाथ सिंह ने कार्यकारिणी की मंजूरी का सवाल उठाया है। नरिंदर बत्रा ने दिलीप तिर्की के कदम का समर्थन किया है। विवाद के बीच हॉकी इंडिया के फैसलों, वित्तीय मंजूरी और जवाबदेही की पड़ताल।
नई दिल्ली, 13 सितंबर 2026: भारतीय हॉकी इस समय एशियाई खेलों की तैयारी में जुटी है, लेकिन मैदान के बाहर हॉकी इंडिया में बड़ा प्रशासनिक टकराव सामने आया है। अध्यक्ष दिलीप तिर्की ने महानिदेशक कमांडर आरके श्रीवास्तव की सभी शक्तियां तत्काल प्रभाव से वापस लेते हुए उन्हें कारण बताओ नोटिस जारी किया है। नोटिस में आठ मामलों में नियमों और निर्देशों का पालन न करने के आरोप लगाए गए हैं और श्रीवास्तव को जवाब देने के लिए चार सप्ताह का समय दिया गया है।
यहां सबसे जरूरी बात यह है कि अभी श्रीवास्तव पर आरोप लगे हैं, आरोप साबित नहीं हुए हैं। कारण बताओ नोटिस किसी अंतिम दोष का फैसला नहीं होता। उनका जवाब आने और हॉकी इंडिया की आगे की कार्रवाई के बाद ही इन आरोपों पर अंतिम स्थिति साफ होगी।
लेकिन Sportsnet News ने हॉकी इंडिया के अपने सार्वजनिक रिकॉर्ड, समितियों की सूची, वित्तीय नियम, अदालत के पुराने और हाल के फैसले तथा पिछले विवादों को देखा तो मामला केवल एक अधिकारी तक सीमित नहीं दिखाई देता। असल सवाल यह है कि हॉकी इंडिया में फैसला कौन करता है, किसके पास कितनी शक्ति है और जब कोई फैसला विवाद में आता है तो जिम्मेदारी किसकी बनती है?
महासचिव ने कार्यकारिणी की मंजूरी पर सवाल उठाया
महानिदेशक की शक्तियां रोकने के निर्देश पर महासचिव भोलानाथ सिंह ने भी आपत्ति जताई है। Sportstar की 12 सितंबर की रिपोर्ट के अनुसार, उन्होंने नोटिस का संज्ञान लेने से इनकार करते हुए कहा कि इसे हॉकी इंडिया की कार्यकारिणी बोर्ड की मंजूरी नहीं मिली थी। इस तरह विवाद अब महानिदेशक पर लगे आरोपों के साथ कार्रवाई की प्रक्रिया और उसे मंजूरी देने के अधिकार तक पहुंच गया है।
कार्यकारिणी के सदस्यों को संबोधित भोलानाथ सिंह के 13 सितंबर के ईमेल के साझा पाठ के अनुसार, उन्होंने श्रीवास्तव को 12 सितंबर के पत्र पर अमल न करने का निर्देश दिया था। उन्होंने दावा किया कि पत्र बिना उचित प्राधिकार और हॉकी इंडिया के उपनियमों के विरुद्ध जारी हुआ था। भोलानाथ ने लिखा कि उन्होंने लोकदीक्षा लॉ एसोसिएट्स के अधिवक्ता हिमांशु चतुर्वेदी से वकील को हॉकी इंडिया की ओर से नियुक्त करने और नोटिस जारी करने का अधिकार देने वाला कार्यकारिणी का प्रस्ताव या प्राधिकार मांगा है।
भोलानाथ ने अनुच्छेद 13.1(a) और 14.7.5 का हवाला देते हुए कहा कि संस्था के प्रबंधन और निर्णयों, तथा महानिदेशक की नियुक्ति और सेवा शर्तों का अधिकार कार्यकारिणी के पास है। उनके अनुसार, अनुच्छेद 14.1.1 और 14.1.3 अध्यक्ष को संस्था के कामकाज की निगरानी और कांग्रेस तथा कार्यकारिणी के निर्णय लागू कराने की भूमिका देते हैं, लेकिन इस तरह का निर्णय एकतरफा लेने का अधिकार नहीं देते।
उन्होंने जूनियर एशिया कप और आगामी एशियाई खेलों का उल्लेख करते हुए ऐसी कार्रवाई से खिलाड़ियों के मनोबल पर असर पड़ने की आशंका भी जताई। ये उपनियमों और कार्रवाई की प्रक्रिया पर भोलानाथ की दलीलें हैं; ईमेल से नोटिस स्वतः रद्द होने या उनकी व्याख्या अंतिम रूप से स्वीकार होने की पुष्टि नहीं होती।
Sportstar में उद्धृत नोटिस के अनुसार, महानिदेशक की शक्तियां रोकने और उन्हें पद के कार्यों से विरत रहने का निर्देश कार्यकारिणी के आगे विचार और निर्णय तक अंतरिम उपाय है। इसे स्थायी बर्खास्तगी या आरोपों पर अंतिम फैसला नहीं माना जाना चाहिए।
बत्रा ने कदम का स्वागत किया, चयन समिति अध्यक्ष के लिए ओलंपियन को प्राथमिकता देने का सुझाव
हॉकी इंडिया के पूर्व अध्यक्ष नरिंदर ध्रुव बत्रा ने 13 सितंबर को दिलीप तिर्की को संबोधित संदेश में आरके श्रीवास्तव की शक्तियां और जिम्मेदारियां वापस लेने के कदम का स्वागत किया। उन्होंने इसे भारतीय हॉकी में मजबूत व्यवस्था और बेहतर प्रशासन की दिशा में आगे बढ़ने का अवसर बताया।
बत्रा ने सुझाव दिया कि पुरुष और महिला वर्ग की सीनियर, जूनियर तथा अन्य आयु-वर्ग की भारतीय टीमों की चयन समितियों के अध्यक्ष पद पर भविष्य की नियुक्तियों में ऐसे ओलंपियन को प्राथमिकता दी जाए, जिसने ओलंपिक में हॉकी में भारत का प्रतिनिधित्व किया हो। उन्होंने हॉकी की तकनीकी जिम्मेदारियां इस खेल की गहरी समझ रखने वाले लोगों को देने की भी बात कही। यह भविष्य की नियुक्तियों के लिए बत्रा का सुझाव है; संदेश किसी नए नियम या नियुक्ति की घोषणा नहीं करता।
भोलानाथ के इस ईमेल पर WhatsApp समूह में साझा अपनी प्रतिक्रिया में बत्रा ने तिर्की का समर्थन करते हुए कहा कि कुछ सदस्यों की व्यक्तिगत सहमति औपचारिक संस्थागत निर्णय की जगह नहीं ले सकती और विवाद को नियमों के अनुसार सक्षम निकाय के सामने रखा जाना चाहिए। उन्होंने भोलानाथ सिंह से स्वतंत्र जांच पूरी होने तक स्वेच्छा से महासचिव की जिम्मेदारियों से अलग रहने की मांग भी की। बत्रा ने इसे निष्पक्ष जांच और संस्थागत मर्यादा से जुड़ी अपनी राय बताया, आरोप सिद्ध होने का निष्कर्ष नहीं।
विवाद की शुरुआत जर्सी से हुई
2026 विश्व कप से पहले भारतीय पुरुष और महिला हॉकी टीमों की पारंपरिक नीली जर्सी की जगह नारंगी जर्सी को मुख्य जर्सी बनाया गया। इस फैसले पर पूर्व खिलाड़ियों और प्रशंसकों ने सवाल उठाए। लेकिन विवाद तब और बड़ा हो गया जब खुद हॉकी इंडिया अध्यक्ष दिलीप तिर्की ने फैसले की प्रक्रिया पर सवाल उठाए। उनका कहना था कि उन्हें और कार्यकारिणी को इस बदलाव की औपचारिक जानकारी बहुत देर से मिली और फैसला पहले ही लिया जा चुका था।
आरके श्रीवास्तव की तरफ से इसका जवाब भी आया। उनके अनुसार जर्सी बदलने का कारण तकनीकी था। नीले मैदान पर नीली जर्सी से खिलाड़ियों को एक-दूसरे को पहचानने में परेशानी की आशंका बताई गई। उन्होंने कहा कि प्रशिक्षकों, वरिष्ठ खिलाड़ियों, टीम नेतृत्व और किट बनाने वाली कंपनी से चर्चा के बाद फैसला हुआ था।
श्रीवास्तव ने यह भी कहा कि पहले भी जर्सी के रंग या डिजाइन में बदलाव के लिए कार्यकारिणी की औपचारिक अनुमति नहीं ली जाती थी और 2022 में भी ऐसा बदलाव किया गया था। यानी विवाद केवल यह नहीं है कि भारतीय टीम नीली जर्सी पहने या नारंगी। सवाल यह है कि ऐसा फैसला लेने का अधिकार किसके पास था?
अगर यह रोजमर्रा का तकनीकी फैसला था तो अध्यक्ष और कार्यकारिणी की मंजूरी क्यों जरूरी थी? और अगर उनकी मंजूरी जरूरी थी तो वर्षों से इसकी साफ प्रक्रिया क्यों नहीं बनाई गई? दिलचस्प बात यह है कि विश्व कप के बाद एशियाई खेलों के लिए हॉकी इंडिया ने फिर नीले रंग को पहली पसंद और नारंगी को दूसरी पसंद बताया है। हालांकि इसे नारंगी जर्सी को हमेशा के लिए खत्म करने का फैसला नहीं कहा गया है।
आरके श्रीवास्तव केवल एक प्रशासनिक अधिकारी नहीं थे
हॉकी इंडिया की वेबसाइट पर उपलब्ध वर्तमान जानकारी आरके श्रीवास्तव को महानिदेशक के रूप में अधिकारी/कर्मचारी की सूची में रखती है, जबकि अध्यक्ष, महासचिव, कोषाध्यक्ष और अन्य निर्वाचित सदस्य अलग कार्यकारिणी का हिस्सा हैं। लेकिन समितियों की सूची देखने पर तस्वीर अलग दिखाई देती है।
31 मार्च 2026 से प्रभावी कई अहम समितियों में आरके श्रीवास्तव सदस्य-संयोजक हैं। इनमें अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिता समिति, घरेलू प्रतियोगिता समिति, खिलाड़ियों की शिकायत समिति, सदस्य इकाइयों की शिकायत समिति, अनुशासन समिति, हॉकी इंडिया लीग संचालन समिति, भ्रष्टाचार विरोधी समिति, उच्च प्रदर्शन एवं विकास समिति और कानूनी समिति शामिल हैं।
वे सूचना के अधिकार से जुड़ी व्यवस्था में अपीलीय अधिकारी भी हैं। अंपायरिंग, तकनीकी और प्रतियोगिता समिति में उन्हें अध्यक्ष बनाया गया है। उम्र संबंधी धोखाधड़ी रोकने वाली समिति में भी वे सदस्य-संयोजक हैं। इससे एक महत्वपूर्ण सवाल पैदा होता है।
अगर आज यह आरोप लगाया जा रहा है कि महानिदेशक ने जरूरत से ज्यादा अधिकार इस्तेमाल किए, तो यह भी देखना होगा कि उन्हें इतनी सारी महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां दी किसने थीं? यह कोई ऐसी शक्ति नहीं थी जो वेबसाइट के रिकॉर्ड के अनुसार उन्होंने अपने आप ले ली हो। हॉकी इंडिया ने खुद उन्हें इन समितियों में रखा था।
एक साल पहले कार्यकारिणी ने खुद दी थी पदोन्नति
30 अप्रैल 2025 को हॉकी इंडिया ने आधिकारिक रूप से घोषणा की थी कि 112वीं कार्यकारिणी बैठक में आरके श्रीवास्तव को कार्यकारी निदेशक से महानिदेशक बनाया गया। उस समय महासचिव भोलानाथ सिंह ने उनकी पदोन्नति को योग्य बताया था और कहा था कि कार्यकारिणी के फैसले प्रशासन को मजबूत करने की दिशा में हैं।
इसलिए आज की जांच में केवल यह सवाल नहीं होना चाहिए कि श्रीवास्तव ने क्या किया। यह भी देखना होगा कि उन्हें किस स्तर तक अधिकार दिए गए, उन अधिकारों की निगरानी किसकी जिम्मेदारी थी और अगर समस्या लंबे समय से थी तो कार्यकारिणी को उसका पता कब चला।
43.68 लाख रुपये का आरोप—सिर्फ रकम नहीं, मंजूरी की प्रक्रिया भी जांचनी होगी
पूर्व हॉकी इंडिया अध्यक्ष नरिंदर बत्रा द्वारा खेल मंत्रालय को भेजे गए पत्र के आधार पर यह आरोप भी सामने आया है कि विश्व कप के दौरान चार पदाधिकारियों और अधिकारियों के भत्तों पर करीब 43.68 लाख रुपये खर्च हुए। रिपोर्ट में आरके श्रीवास्तव के अलावा महासचिव भोलानाथ सिंह, कोषाध्यक्ष सेकर जे. मनोहरन और आरपी सिंह से जुड़े भत्तों का भी उल्लेख है।
यहां बहुत साफ अंतर रखना जरूरी है। 43.68 लाख रुपये की रकम को इस समय घोटाला नहीं कहा जा सकता। यह एक आरोप है। अभी किसी स्वतंत्र लेखा जांच ने सार्वजनिक रूप से यह साबित नहीं किया है कि यह भुगतान अवैध था। लेकिन हॉकी इंडिया की अपनी वेबसाइट पर उपलब्ध वित्तीय कार्यप्रणाली इस मामले में बड़े सवाल पैदा करती है।
हॉकी इंडिया की यात्रा और दैनिक भत्ता नीति में यात्रा भत्ता लेने वाले व्यक्ति के लिए फॉर्म भरना, यात्रा, ठहरने और भोजन के मूल बिल देना और सामान्य तौर पर यात्रा समाप्त होने के 15 दिन के भीतर दावा जमा करना जरूरी बताया गया है। हॉकी इंडिया की वेबसाइट पर उपलब्ध वित्तीय कार्यप्रणाली में भुगतान से पहले बिल दर्ज करने, दस्तावेजों की जांच, वित्त अधिकारी की जांच और संबंधित अधिकारियों की मंजूरी की व्यवस्था दी गई है। चेक भुगतान के लिए अध्यक्ष या महासचिव तथा कोषाध्यक्ष के हस्ताक्षर का भी उल्लेख है। उसी दस्तावेज में वित्त और लेखा समिति को खरीद और भुगतान की अंतिम जिम्मेदार संस्था बताया गया है।
एक बात ध्यान रखने की है—यह दस्तावेज पुराने पदनाम जैसे CEO और Executive Director इस्तेमाल करता है। इसलिए पहले यह भी साफ होना चाहिए कि वर्तमान व्यवस्था में इसके कौन से प्रावधान अब भी लागू हैं और किनमें बदलाव हुआ है। लेकिन अगर यही या इसी तरह की प्रक्रिया वर्तमान में लागू थी तो केवल यह पूछना काफी नहीं होगा कि किस अधिकारी ने कितने रुपये लिए।
यह भी पूछना होगा कि यात्रा किसने मंजूर की, दावा किसने जांचा, भुगतान पर किसके हस्ताक्षर हुए और वित्त एवं लेखा समिति के सामने क्या रिकॉर्ड गया। अगर सभी मंजूरियां नियम के अनुसार हुई थीं तो अब खर्च पर आपत्ति क्यों है? और अगर नियमों का पालन नहीं हुआ तो जिम्मेदारी केवल दावा करने वाले व्यक्ति की नहीं हो सकती।
विश्व कप यात्रा पर भी यही सवाल
आरके श्रीवास्तव को दिए गए नोटिस में आरोप लगाया गया है कि अध्यक्ष ने उन्हें विश्व कप के दौरान भारत में रहकर हॉकी इंडिया लीग और दूसरे जरूरी काम देखने के निर्देश दिए थे, लेकिन इसके बावजूद वे नीदरलैंड और बेल्जियम गए। अगर कोई साफ लिखित निर्देश था और उसकी जानबूझकर अनदेखी की गई तो मामला गंभीर है।
लेकिन यहां भी जरूरी है कि हॉकी इंडिया यह साफ करे कि किसी वरिष्ठ अधिकारी की विदेश यात्रा की अंतिम मंजूरी किस स्तर पर होती है। क्या महानिदेशक अकेले विदेश जाने का फैसला कर सकता था? क्या महासचिव या कार्यकारिणी की मंजूरी जरूरी थी? यात्रा खर्च किसने स्वीकृत किया?
इन सवालों के जवाब ईमेल से नहीं, दस्तावेजों से सामने आने चाहिए।
अनुशासन वाले मामले में भी जिम्मेदारी केवल महानिदेशक की नहीं दिखती
कारण बताओ नोटिस में खिलाड़ियों के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई में देरी का मुद्दा भी बताया गया है। हॉकी इंडिया की वर्तमान समिति सूची के अनुसार अनुशासन समिति के अध्यक्ष महासचिव भोलानाथ सिंह हैं और आरके श्रीवास्तव सदस्य-संयोजक हैं। ऐसे में यह जानना जरूरी होगा कि जिस मामले में कार्रवाई न होने या देर से होने का आरोप है, उसमें अनुशासन समिति की बैठक हुई या नहीं, क्या कोई लिखित सिफारिश बनी और समिति अध्यक्ष को क्या जानकारी दी गई।
अगर फैसला किसी समिति के माध्यम से होना था तो उसकी जिम्मेदारी भी उसी ढांचे के अनुसार तय होनी चाहिए।
2022 में अदालत नियुक्त अधिकारियों की शक्ति पर पहले ही सवाल उठा चुकी है
हॉकी इंडिया में निर्वाचित पदाधिकारी और नियुक्त पेशेवर अधिकारी के बीच शक्ति का सवाल नया नहीं है। मई 2022 में दिल्ली हाई कोर्ट ने हॉकी इंडिया के पुराने संविधान में CEO को कार्यकारिणी में मतदान का अधिकार और अध्यक्ष तथा महासचिव जैसी शक्तियां दिए जाने पर आपत्ति जताई थी। अदालत ने कहा था कि किसी नियुक्त CEO को अध्यक्ष या महासचिव की शक्तियां नहीं दी जा सकतीं और पेशेवर विशेषज्ञों को रखा जा सकता है, लेकिन वे निर्वाचित प्रबंधन संस्था की जगह नहीं ले सकते।
सुप्रीम कोर्ट ने अगस्त 2022 में दिल्ली हाई कोर्ट के उस फैसले में हस्तक्षेप नहीं किया और संविधान को खेल संहिता के अनुरूप बनाने की प्रक्रिया जारी रखने दी। यह फैसला वर्तमान महानिदेशक के मामले का सीधा फैसला नहीं है। CEO और Director General अलग पद हैं और वर्तमान संविधान भी उस समय के संविधान जैसा नहीं माना जा सकता।
लेकिन इस पुराने मामले का सिद्धांत महत्वपूर्ण है—राष्ट्रीय खेल संघ में नियुक्त अधिकारी और निर्वाचित नेतृत्व की शक्तियों की सीमा साफ होनी चाहिए। आज का विवाद फिर उसी मूल सवाल की तरफ लौटता दिखाई देता है।
हाल का अदालत मामला भी प्रशासन पर सवाल छोड़ गया
अप्रैल 2026 में दिल्ली हाई कोर्ट ने हॉकी इंडिया की उपाध्यक्ष सैयद असीमा अली को कार्यकारिणी की दो बैठकों के लिंक न दिए जाने को अदालत के आदेश की जानबूझकर अवहेलना माना। अदालत ने हॉकी इंडिया और विशेष रूप से महासचिव भोलानाथ सिंह को अवमानना का दोषी माना और टिप्पणी की कि राष्ट्रीय खेल संघ द्वारा अदालत के आदेश का पालन न करना किसी “प्रशासनिक पाप” से कम नहीं है।
यह मामला आरके श्रीवास्तव को दिए गए मौजूदा नोटिस से अलग है। लेकिन यह जरूर दिखाता है कि हॉकी इंडिया में कार्यकारिणी की भूमिका, प्रशासनिक प्रक्रिया और फैसलों के तरीके पर सवाल जर्सी विवाद के बाद अचानक पैदा नहीं हुए।
असुंता लाकड़ा मामले की स्वतंत्र जांच भी चल रही है
इसी बीच भारतीय महिला हॉकी टीम की पूर्व कप्तान और हॉकी इंडिया कार्यकारिणी की सदस्य असुंता लाकड़ा के आरोपों की स्वतंत्र जांच चल रही है। लाकड़ा का आरोप है कि झारखंड में एक स्थानीय कोच पर लगे लड़कियों के कथित यौन उत्पीड़न के आरोपों का विरोध करने के बाद महासचिव भोलानाथ सिंह ने उन्हें धमकाया और परेशान किया। भारतीय ओलंपिक संघ ने खेल मंत्रालय के निर्देश पर सेवानिवृत्त हाई कोर्ट न्यायाधीश दीपा शर्मा की अध्यक्षता में चार सदस्यीय जांच समिति बनाई है। आरोप अभी सिद्ध नहीं हुए हैं।
यह मामला महानिदेशक वाले विवाद से अलग है और दोनों को मिलाना सही नहीं होगा। लेकिन जब एक ही राष्ट्रीय खेल संघ में एक तरफ महानिदेशक की सभी शक्तियां रोक दी जाती हैं, दूसरी तरफ महासचिव से जुड़े आरोपों की स्वतंत्र जांच चलती है और तीसरी तरफ अध्यक्ष खुद फैसले लेने की प्रक्रिया पर सवाल उठा चुके हों, तो प्रशासनिक व्यवस्था की व्यापक समीक्षा की जरूरत जरूर दिखाई देती है।
अंदरूनी खींचतान का आरोप 2024 में भी लगा था
फरवरी 2024 में लगभग 13 साल तक हॉकी इंडिया की मुख्य कार्यकारी अधिकारी रहीं एलेना नॉर्मन ने इस्तीफा देते समय आरोप लगाया था कि संस्था के भीतर दो गुट काम कर रहे हैं। उनके मुताबिक एक तरफ दिलीप तिर्की और वे थीं, जबकि दूसरी तरफ भोलानाथ सिंह, आरके श्रीवास्तव और कोषाध्यक्ष सेकर जे. मनोहरन थे।
हॉकी इंडिया ने उस समय इन आरोपों को खारिज किया था। दिलीप तिर्की और भोलानाथ सिंह ने संयुक्त बयान देकर कहा था कि संस्था में कोई गुटबाजी नहीं है और सभी मिलकर काम कर रहे हैं। दो साल पुराने आरोप को आज के विवाद का प्रमाण नहीं माना जा सकता।
लेकिन मौजूदा हालात में यह पुराना घटनाक्रम फिर प्रासंगिक हो गया है और बताता है कि भीतर की असहमति की चर्चा पहले भी हो चुकी है।
अब जांच सिर्फ एक अधिकारी की नहीं, पूरे फैसले लेने के तरीके की होनी चाहिए
आरके श्रीवास्तव को कारण बताओ नोटिस मिला है। उन्हें जवाब देना होगा और अगर आरोप साबित होते हैं तो नियमों के अनुसार कार्रवाई होनी चाहिए। लेकिन जांच केवल यहीं खत्म नहीं हो सकती। क्योंकि हॉकी इंडिया ने ही उन्हें महानिदेशक बनाया। हॉकी इंडिया ने ही उन्हें अनेक महत्वपूर्ण समितियों में रखा।
हॉकी इंडिया के वित्तीय दस्तावेज भुगतान के लिए कई स्तर की मंजूरी बताते हैं। अनुशासन समिति में भी वे अकेले नहीं थे। इसलिए यदि व्यवस्था में गंभीर गलती हुई है तो यह पता लगाना जरूरी है कि गलती कहां हुई—फैसला लेने में, मंजूरी देने में, निगरानी में या जवाबदेही तय करने में।
कुछ दस्तावेज सामने आने से पूरी तस्वीर काफी साफ हो सकती है। जर्सी बदलने का फैसला किस लिखित प्रक्रिया से हुआ? विश्व कप यात्रा किसने मंजूर की? 43.68 लाख रुपये बताए जा रहे भत्तों के दावों पर किन अधिकारियों की मंजूरी थी? अनुशासन समिति की बैठकों और फैसलों का रिकॉर्ड क्या कहता है?
कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न से जुड़े रिकॉर्ड की जिम्मेदारी किस अधिकारी की थी? और जिन समितियों में महानिदेशक अहम भूमिका में थे, उनकी जिम्मेदारी अब कौन संभालेगा? इन सवालों के जवाब आरोपों और जवाबी आरोपों से नहीं मिलेंगे। जवाब बैठक की कार्यवाही, यात्रा मंजूरी, भुगतान रिकॉर्ड, समिति के फैसले और हॉकी इंडिया के लिखित नियम देंगे।
फिलहाल इतना जरूर साफ है कि जर्सी विवाद से शुरू हुई यह लड़ाई अब सिर्फ जर्सी के रंग की नहीं रही। यह हॉकी इंडिया में शक्ति, प्रक्रिया और जवाबदेही की लड़ाई बन चुकी है।







