संगठन का नाम बदलने से कितना बदलेगा खिलाड़ी का अनुभव? विश्वविद्यालय खेलों में असली परीक्षा निष्पक्ष चयन, पारदर्शी खर्च और शिकायतों पर कार्रवाई की है।
AIU और IUSF के बीच विश्वविद्यालय खेलों के अधिकार को लेकर चल रहा टकराव भारतीय खेल प्रशासन के सामने एक पुराना सवाल फिर रखता है: संस्थाओं की प्राथमिकता खिलाड़ी हैं या अपना प्रभाव बनाए रखना? यह सवाल केवल खेल संघों से नहीं, खेल व्यवस्था से जुड़े प्रशासकों और सरकारों से भी पूछा जाना चाहिए।
इंटर यूनिवर्सिटी प्रतियोगिताओं में खिलाड़ियों के साथ अन्याय और पदक बेचने तक की शिकायतें उठती रही हैं। ये शिकायतें अपने आप किसी की दोषसिद्धि नहीं हैं, लेकिन इन पर जवाबदेही जरूरी है। लेखक के संज्ञान में ऐसी कोई स्पष्ट कार्रवाई नहीं आई, जिसमें AIU के शीर्ष नेतृत्व ने इन शिकायतों पर निर्णायक आदेश देकर सुधार सुनिश्चित किया हो। इसके मुकाबले संस्था के अधिकारों को चुनौती मिलते ही दिखाई दी तत्परता ध्यान खींचती है।
IUSF को खेल मंत्रालय की मान्यता और विश्वविद्यालय प्रतियोगिताओं की जिम्मेदारी मिलने की खबर के बाद AIU में बैठकों और विचार-विमर्श का दौर शुरू हुआ। विश्वविद्यालयों को भेजे गए पत्र में नई संस्था से जुड़े उन लोगों का भी उल्लेख किया गया जो पहले AIU में काम कर चुके थे और जिन्हें हटाया गया था अथवा जो अपने मूल संगठन में लौट गए थे।
AIU ने दिल्ली हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया और मंत्रालय के मान्यता पत्र पर अंतरिम रोक मिल गई। इसे अंतिम जीत मान लेना जल्दबाजी होगी। कानूनी विवाद का अंतिम निपटारा अभी बाकी है। फिलहाल खिलाड़ियों के नजरिए से यह देखना अधिक जरूरी है कि कौन-सी व्यवस्था उनके लिए बेहतर साबित हो सकती है।
IUSF को NSF का दर्जा सुधार की दिशा में अवसर दे सकता है। उससे अच्छे प्रशासन की गारंटी नहीं मिलती। इसी तरह AIU का पुराना अनुभव तभी मायने रखेगा, जब खिलाड़ियों की शिकायतों पर जिम्मेदारी भी तय हो।
खिलाड़ी की चिंता सीधी है: उसे बराबरी से खेलने का अवसर मिले, चयन में पक्षपात न हो, प्रमाणपत्र समय पर मिले और अन्याय की स्थिति में सुनवाई का रास्ता उपलब्ध हो। अधिकारों की इस लड़ाई में यही सवाल केंद्र में रहना चाहिए कि बदलाव से खिलाड़ियों की स्थिति सुधरेगी या सिर्फ व्यवस्था चलाने वाले बदलेंगे।
अंतरिम रोक को अंतिम निर्णय न समझें
15 अक्टूबर 2026 को दिल्ली हाई कोर्ट ने AIU की याचिका पर खेल मंत्रालय के 5 अक्टूबर के उस पत्र पर अगली सुनवाई तक रोक लगाई, जिसके माध्यम से IUSF को मान्यता दी गई थी। अगली सुनवाई 13 जनवरी 2027 के लिए निर्धारित की गई है। इस आदेश पर Sportsnet की पूर्व रिपोर्ट
लेखक की समझ में, चल रही विश्वविद्यालय प्रतियोगिताएँ प्रभावित न हों, यह अंतरिम राहत की पृष्ठभूमि में एक महत्वपूर्ण चिंता रही होगी। इस आकलन को अदालत का अंतिम निष्कर्ष नहीं माना जाना चाहिए।
अंतरिम आदेश से AIU के पूरे कामकाज को सही होने का प्रमाण नहीं मिल जाता। इसी तरह यह IUSF के विरुद्ध अंतिम फैसला भी नहीं है। इसलिए वर्तमान स्थिति को समझते समय अस्थायी न्यायिक राहत और विवाद के अंतिम निर्णय का फर्क स्पष्ट रखना जरूरी है।
NSF और NSPO: खिलाड़ी के लिए फर्क कहाँ पड़ता है?
NSF का अर्थ राष्ट्रीय खेल महासंघ है। मान्यता के दायरे में आने वाले खेल या क्षेत्र का संचालन, प्रतियोगिताओं का आयोजन और चयन जैसी जिम्मेदारियाँ इससे जुड़ती हैं।
NSPO यानी राष्ट्रीय खेल प्रोत्साहन संगठन का उद्देश्य अपने संस्थागत दायरे या नेटवर्क में खेलों को बढ़ावा देना है। विश्वविद्यालय खेलों में AIU इसी श्रेणी के अंतर्गत कार्य करता रहा है।
NSF के माध्यम से खिलाड़ियों के लिए सुविधाएँ और सहयोग बढ़ाने की संभावना हो सकती है। लेकिन इस तुलना में AIU के लिए बनाए गए विशेष प्रावधान को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। राष्ट्रीय खेल विकास संहिता, 2011 में AIU को NSPO होने के बावजूद प्राथमिकता श्रेणी के राष्ट्रीय खेल महासंघों के समकक्ष सरकारी सहायता की पात्रता दी गई थी। इसलिए NSPO का दर्जा होने से उसके लिए सरकारी सहयोग का रास्ता बंद था, ऐसा कहना सही नहीं होगा। राष्ट्रीय खेल विकास संहिता, 2011
एक NSF अपनी भूमिका और लागू योजनाओं के अनुसार अधिक सरकारी सहयोग जुटाने की कोशिश कर सकता है। फिर भी नौकरी, प्रवेश, छात्रवृत्ति या नकद पुरस्कार में खिलाड़ी को क्या लाभ मिलेगा, यह संबंधित नियमों से तय होगा। आयोजक के NSF बन जाने से विश्वविद्यालय प्रतियोगिता का पदक उसी खेल की सीनियर राष्ट्रीय चैंपियनशिप के पदक के बराबर अपने आप नहीं हो जाता।
लेखक की तुलना में AIU से अलग अन्य लगभग दस-ग्यारह NSPO के लिए NSF जैसी सहायता और प्रमाणपत्रों की स्वीकार्यता समान स्तर की नहीं दिखाई देती। इस तुलना का अर्थ समझते समय प्रत्येक संस्था की स्थिति और संबंधित लाभ की शर्तें अलग देखनी होंगी।
IUSF से बदलाव की उम्मीद क्यों की जा सकती है?
IUSF के पक्ष में सबसे महत्वपूर्ण संभावना विश्वविद्यालय खेलों के लिए एक समर्पित संगठन की है। AIU में यह जिम्मेदारी सीमित अधिकारियों के माध्यम से निभाई जाती रही है; इसके मुकाबले पूरी तरह खेलों पर केंद्रित एक व्यापक संस्था अधिक व्यवस्थित ढंग से काम कर सकती है।
यदि जिम्मेदारी मिलने पर पेशेवर व्यवस्था विकसित की जाए, तो नियमित वार्षिक कैलेंडर, बेहतर प्रशिक्षण, खेल विज्ञान की मदद, चोट के बाद पुनर्वास और संबंधित राष्ट्रीय खेल महासंघों के साथ तकनीकी तालमेल मजबूत हो सकता है।
विश्वविद्यालय प्रतियोगिताओं को केवल पदक वितरण तक सीमित रखने के बजाय उभरती प्रतिभाओं की पहचान और उन्हें अंतरराष्ट्रीय स्तर तक पहुँचाने की प्रक्रिया से जोड़ा जा सकता है।
इन बातों को अभी उपलब्धि नहीं, संभावनाओं के रूप में देखना होगा। इन्हें वास्तविक रूप देने के लिए प्रशिक्षित कर्मचारी, पर्याप्त बजट, विश्वविद्यालयों का सहयोग और आयोजन संभालने की क्षमता चाहिए। IUSF की परीक्षा इस बात पर भी होगी कि छोटे विश्वविद्यालयों और सीमित साधनों वाले खिलाड़ियों को प्रभावशाली संस्थानों के बराबर अवसर मिलता है या नहीं।
नई संस्था के साथ कौन-से सवाल बने रहेंगे?
नई पहचान अपनाने से प्रशासन की पुरानी कमियाँ स्वतः समाप्त नहीं होतीं। प्रवेश, सदस्यता, मेजबानी या चयन के लिए अस्पष्ट शुल्क, कुछ लोगों तक सीमित निर्णय और शिकायतों की जाँच में स्वतंत्रता का अभाव किसी नई संस्था में भी वही समस्याएँ पैदा कर सकता है।
मूल लेख में उल्लिखित AIU के 9 अक्टूबर के पत्र में डॉ. बीनू जॉर्ज और गौरव राय का नाम आता है। डॉ. बीनू जॉर्ज AIU में संयुक्त सचिव रह चुके हैं। लेखक के अनुसार, उस पत्र में उनके विरुद्ध कोई आरोप नहीं लगाया गया था। हालांकि सूत्रों के हवाले से एक बैठक में उनके संबंध में कुछ कथित दस्तावेज AIU के पास होने की बात कही गई। लेखक के पास वे दस्तावेज उपलब्ध नहीं हैं और उन्हें देखा भी नहीं गया है। इसलिए इस सूचना या उससे निकलने वाले किसी आरोप की पुष्टि नहीं की जा रही है।
उसी पत्र के बारे में मूल लेख में कहा गया है कि गौरव राय को गंभीर प्रशासनिक आरोपों के चलते AIU से हटाए जाने का उल्लेख था। यह AIU के पत्र के हवाले से रखा गया आरोप है, किसी स्वतंत्र जाँच या न्यायिक दोषसिद्धि का निष्कर्ष नहीं। लेखक के मुताबिक, राय दस-बारह वर्षों से अधिक समय तक AIU के खेल विभाग से जुड़े रहे। इतने लंबे कार्यकाल के कारण उनसे विभाग के अच्छे और खराब, दोनों तरह के कामकाज की जानकारी तथा अपनी भूमिका पर स्पष्टीकरण की अपेक्षा स्वाभाविक है। उनके व्यक्तिगत उत्तरदायित्व का निष्कर्ष प्रमाण और जाँच से ही निकलना चाहिए।
इसीलिए IUSF को आरंभ से स्पष्ट करना चाहिए कि कौन-से शुल्क अधिकृत हैं, भुगतान किस खाते में होगा, संस्था की ओर से बातचीत या समझौते का अधिकार किसके पास है और अलग-अलग पदाधिकारियों की शक्तियाँ क्या होंगी।
अध्यक्ष अच्युत सामंत की सार्वजनिक पहचान संस्था के प्रति भरोसा बढ़ा सकती है। फिर भी यह देखना आवश्यक होगा कि अध्यक्ष के पास वास्तविक निर्णयकारी अधिकार कितने हैं और उनकी भूमिका केवल नाम तक सीमित तो नहीं रहेगी। किसी एक प्रतिष्ठित व्यक्ति की मौजूदगी पूरी कार्यकारिणी की जवाबदेही का विकल्प नहीं हो सकती। जिम्मेदारियों, संभावित हितों के टकराव और फैसलों की समीक्षा की कसौटी AIU तथा IUSF, दोनों के लिए समान होनी चाहिए।
AIU के अनुभव और नेटवर्क की अहमियत
विश्वविद्यालयों के साथ वर्षों पुराने संबंध और प्रतियोगिताएँ संचालित करने का अनुभव AIU की प्रमुख ताकत हैं। खेल विभागों, मेजबान विश्वविद्यालयों और खिलाड़ियों के बीच बनी व्यवस्था को एक झटके में बदल देना आसान नहीं होगा।
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी AIU का संबंध पुराना है। FISU की भारत संबंधी सदस्य सूची में AIU का नाम दर्ज है और सदस्यता का वर्ष 1967 बताया गया है। इससे यह समझना जरूरी हो जाता है कि भारत में सरकारी मान्यता और अंतरराष्ट्रीय संगठन की सदस्यता अलग विषय हैं। FISU की भारत सदस्य सूची
हालाँकि लंबे अनुभव के आधार पर सवालों से छूट नहीं मिल सकती। पुरानी और व्यापक व्यवस्था में रिकॉर्ड की शुद्धता तथा जवाबदेही की आवश्यकता और बढ़ जाती है।
प्रमाणपत्र और रिकॉर्ड पर AIU से जवाब क्यों जरूरी है?
लेखक को पहले उपलब्ध कराए गए दस्तावेजों में खेल प्रमाणपत्रों के कथित इस्तेमाल, प्रमाणपत्र रद्द किए जाने संबंधी पत्रों और कुछ रिकॉर्ड उपलब्ध न होने के प्रश्न सामने आए थे। इन विषयों का स्पष्ट उत्तर देना संस्था की जिम्मेदारी है। इन्हें यहाँ सिद्ध गड़बड़ी के रूप में नहीं, स्पष्टीकरण और जवाबदेही की माँग करने वाले सवालों के रूप में रखा जा रहा है।
दोनों व्यवस्थाओं की संभावनाएँ और चुनौतियाँ
| संचालन | संभावित मजबूत पक्ष | मुख्य चुनौती |
|---|---|---|
| AIU | स्थापित विश्वविद्यालय नेटवर्क, आयोजन का अनुभव और पुराने अंतरराष्ट्रीय संबंध | रिकॉर्ड की विश्वसनीयता तथा प्रशासनिक जवाबदेही सुनिश्चित करना |
| IUSF | विश्वविद्यालय खेलों पर समर्पित ध्यान और पेशेवर व्यवस्था नए सिरे से बनाने का अवसर | आयोजन क्षमता विकसित करना, समान प्रतिनिधित्व देना और अधिकारों का केंद्रीकरण रोकना |
इनमें कई जोखिम संस्था की श्रेणी से अधिक उसके व्यवहार और निर्णय प्रक्रिया से जुड़े हैं। NSF और NSPO, दोनों के कामकाज में पारदर्शिता आवश्यक है।
खिलाड़ियों के हित में सात जरूरी शर्तें
विश्वविद्यालय खेलों की जिम्मेदारी जिस संस्था के पास हो, उसके लिए कुछ बुनियादी शर्तें स्पष्ट होनी चाहिए:
- प्रतियोगिताओं का कैलेंडर और चयन के नियम पहले ही सार्वजनिक किए जाएँ।
- शुल्क निर्धारित हों, पैसा अधिकृत खाते में जमा हो और प्रत्येक भुगतान की रसीद मिले।
- परिणामों और प्रमाणपत्रों की ऑनलाइन जाँच की सुविधा उपलब्ध हो।
- चयनकर्ताओं के नाम तथा उनके संभावित हितों के टकराव की जानकारी दी जाए।
- शिकायत की स्वतंत्र जाँच हो और निर्धारित समय में अपील सुनी जाए।
- खातों, जाँच रिपोर्टों और की गई कार्रवाई का विवरण सार्वजनिक किया जाए।
- प्रशासनिक बदलाव से पुराने वैध नतीजे और खिलाड़ियों के अवसर प्रभावित न हों।
अधिकारों के लिए दिखाई गई सक्रियता खिलाड़ियों के लिए भी हो
अपना पक्ष रखने के लिए अदालत जाना AIU का अधिकार है। इस कदम से अकेले यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि पदाधिकारी केवल पद, पैसा या प्रभाव बचाना चाहते हैं।
फिर भी सवाल बना रहेगा: अपने अधिकारों की रक्षा में संस्था जितनी सक्रिय दिखती है, क्या खिलाड़ी की शिकायत, गलत प्रमाणपत्र या छूट गई अंतरराष्ट्रीय एंट्री पर भी उतनी ही तत्परता दिखाई देती है?
IUSF से भी यही कसौटी लागू करके सवाल पूछने होंगे। जिम्मेदारी और अधिकार माँगने वाली संस्था को अपनी जवाबदेही की व्यवस्था पहले सामने रखनी चाहिए।
IUSF लंबे समय में बेहतर विकल्प बन सकती है, बशर्ते उसके सुधार खिलाड़ियों को मैदान पर महसूस हों। AIU भी अपनी उपयोगिता बनाए रख सकती है, यदि वह कमियों की स्वतंत्र जाँच और ठोस सुधार के लिए तैयार हो।
विश्वविद्यालय खेलों का संचालन किसी संगठन का स्थायी हक मानकर नहीं चलना चाहिए। यह खिलाड़ियों के प्रति जिम्मेदारी है। भरोसा उसी संस्था पर बनना चाहिए जो प्रतियोगिता, चयन और शिकायत के निपटारे में निष्पक्षता दिखाए।
FISU में AIU की जगह IUSF आए तो क्या बदलेगा?
यदि भविष्य में AIU के स्थान पर IUSF को FISU की सक्रिय सदस्यता मिलती है, तो भारत की ओर से काम करने वाला संगठन, अधिकृत प्रतिनिधि और उम्मीदवार प्रस्तावित करने वाली संस्था बदल सकती है। इससे भारत के लिए अतिरिक्त मत या कार्यकारी समिति में सुनिश्चित स्थान पैदा नहीं होगा। FISU के नियमों में सक्रिय सदस्य संस्था के लिए एक मत की व्यवस्था है; कार्यकारी समिति की सदस्यता चुनाव से जुड़ी है। FISU के नियम
बेहतर तैयारी, योग्य उम्मीदवारों, दूसरे देशों के साथ सहयोग और प्रभावी प्रस्तावों से IUSF भारत की भूमिका मजबूत करने की कोशिश कर सकती है। ऐसा प्रभाव उसके काम से बनेगा, केवल NSF का दर्जा मिलने या सदस्य संस्था बदलने से अपने आप नहीं।
मंत्रालय के मान्यता पत्र पर हाई कोर्ट की अंतरिम रोक का अर्थ IUSF का अस्तित्व समाप्त हो जाना नहीं है। दोनों संस्थाओं के बीच टकराव जिस रूप में बढ़ा है, वह विश्वविद्यालय खेलों और खिलाड़ियों के लिए चिंता का विषय है। अधिकारों की खींचतान से आगे बढ़कर ऐसी व्यवस्था बननी चाहिए जिसमें खिलाड़ी को बेहतर अवसर, भरोसेमंद प्रक्रिया और समय पर न्याय मिले।








