ग्लासगो कॉमनवेल्थ गेम्स 2026 में भारत के 39 पदकों का विश्लेषण
ग्लासगो 2026 में भारत ने 13 स्वर्ण सहित कुल 39 पदक जीतकर चौथा स्थान हासिल किया।
ग्लासगो कॉमनवेल्थ गेम्स 2026 में भारत के 39 पदकों का विश्लेषण
ग्लासगो 2026 में भारत ने 13 स्वर्ण सहित कुल 39 पदक जीतकर चौथा स्थान हासिल किया।

कॉमनवेल्थ गेम्स 2026 में भारत ने 13 स्वर्ण, 17 रजत और 9 कांस्य सहित कुल 39 पदक जीतकर चौथा स्थान हासिल किया। पहली नजर में यह बर्मिंघम 2022 के 61 पदकों से बड़ी गिरावट दिखती है, लेकिन ग्लासगो का छोटा खेल कार्यक्रम, भारत के मजबूत खेलों का बाहर होना और 124 खिलाड़ियों का सीमित दल पूरी कहानी बदल देता है। यह तथ्य-आधारित विश्लेषण ₹53.09 करोड़ के सरकारी तैयारी खर्च, सरकार और IOA की अपेक्षाओं, सपोर्ट स्टाफ, छूटे अवसरों और पदक तालिका के पीछे की अनसुनी भारतीय कहानियों की पड़ताल करता है।

यह विश्लेषण 3 अगस्त 2026 तक उपलब्ध आधिकारिक परिणामों और सार्वजनिक रिपोर्टों पर आधारित है।

मुख्य तथ्य: भारत चौथे स्थान पर रहा; 39 पदकों में 13 स्वर्ण थे। 2022 के 30 भारतीय पदक उन छह खेलों से आए थे जो ग्लासगो 2026 में शामिल ही नहीं थे। तुलनीय खेलों में भारत का प्रदर्शन 31 से बढ़कर 39 पदक हुआ।

कॉमनवेल्थ गेम्स 2026 में भारत की पदक तालिका

ग्लासगो की आखिरी शाम मुक्केबाजी रिंग लगभग भारतीय रंग में रंग गई थी। भारत के दस मुक्केबाज फाइनल तक पहुंचे और सात स्वर्ण लेकर लौटे—कॉमनवेल्थ गेम्स मुक्केबाजी इतिहास में किसी देश का सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन। अंतिम तालिका में भारत 13 स्वर्ण, 17 रजत और 9 कांस्य, यानी कुल 39 पदकों के साथ चौथे स्थान पर रहा। IOA की आधिकारिक पदक सूची में सभी भारतीय पदक विजेताओं का विवरण उपलब्ध है।

खेलवार देखें तो मुक्केबाजी ने 10, भारोत्तोलन ने 8, सक्षम एथलेटिक्स ने 10, पैरा-एथलेटिक्स ने 6, जूडो ने 4 और पैरा-पावरलिफ्टिंग ने एक पदक दिया। यानी 39 में से 34 पदक मुक्केबाजी, भारोत्तोलन और एथलेटिक्स/पैरा-एथलेटिक्स से आए। दूसरी ओर तैराकी, ट्रैक साइक्लिंग, जिम्नास्टिक्स और लॉन बॉल्स में भारत पदक नहीं जीत सका।

61 से 39 पदक: गिरावट या बेहतर प्रदर्शन?

सीधा हिसाब कहता है कि भारत ने 2022 से 22 पदक कम जीते—लगभग 36 प्रतिशत की गिरावट। इस अर्थ में “भारत के पदक बढ़े” कहना सही नहीं होगा। लेकिन ग्लासगो 2026 सामान्य कॉमनवेल्थ गेम्स नहीं था। बर्मिंघम के 19 खेलों की जगह केवल 10 खेल रखे गए।

कुश्ती, बैडमिंटन, टेबल टेनिस, हॉकी, स्क्वैश और महिला क्रिकेट जैसे भारत के मजबूत खेल कार्यक्रम से बाहर थे। भारत ने 2022 में इन्हीं छह खेलों से 30 पदक जीते थे—कुश्ती 12, टेबल टेनिस 7, बैडमिंटन 6, हॉकी 2, स्क्वैश 2 और महिला क्रिकेट एक। यानी पिछली बार के लगभग आधे पदकों का रास्ता प्रतियोगिता शुरू होने से पहले ही बंद हो गया था। बर्मिंघम 2022 की खेलवार भारतीय सूची इसकी पुष्टि करती है।

अगर केवल उन खेल-परिवारों की तुलना की जाए जो ग्लासगो में उपलब्ध थे, तो 2022 का आधार 31 पदक और 9 स्वर्ण बनता है। 2026 में उन्हीं उपलब्ध खेलों ने 39 पदक और 13 स्वर्ण दिए। यह कुल पदकों में लगभग 26 प्रतिशत और स्वर्ण पदकों में 44 प्रतिशत वृद्धि है। भार-वर्ग, स्पर्धाएं और पैरा कार्यक्रम बदलने के कारण यह पूरी तरह समान तुलना नहीं है, फिर भी निष्कर्ष स्पष्ट है: भारत का कुल पदक-ढेर छोटा हुआ, लेकिन उपलब्ध खेलों में प्रदर्शन बेहतर हुआ।

भारत ने ग्लासगो 2026 की तैयारी पर कितना खर्च किया?

खेल मंत्रालय के अनुसार भारतीय खिलाड़ियों की तैयारी पर ₹53.09 करोड़ खर्च किए गए। इसमें ₹48.90 करोड़ वार्षिक प्रशिक्षण एवं प्रतियोगिता कैलेंडर के तहत और ₹4.19 करोड़ TOPS के अंतर्गत थे। एथलेटिक्स को ₹21.52 करोड़, मुक्केबाजी को ₹10.27 करोड़ और भारोत्तोलन को ₹7.55 करोड़ मिले। पंद्रह विदेशी प्रशिक्षकों के साथ अमेरिका, पोलैंड, स्विट्जरलैंड, तुर्किये, दक्षिण अफ्रीका, फ्रांस, आयरलैंड और ब्रिटेन में शिविर अथवा प्रतियोगिताएं आयोजित की गईं। मंत्रालय से साझा मदवार खर्च में इसका विवरण दिया गया है।

साधारण भाग लगाने पर यह लगभग ₹1.36 करोड़ प्रति पदक बनता है, लेकिन इसे खेलों का निवेश-प्रतिफल मानना भ्रामक होगा। यह राशि केवल ग्लासगो में पदक जीतने के लिए नहीं थी; विदेशी अनुभव, प्रशिक्षक और आगामी एशियाई खेल तथा ओलंपिक चक्र की तैयारी भी इसी व्यवस्था का हिस्सा हैं।

यह भी जरूरी है कि ₹53.09 करोड़ को भारत का पूरा कॉमनवेल्थ गेम्स बिल न माना जाए। यह सार्वजनिक रूप से बताया गया सरकारी तैयारी व्यय है। विमान यात्रा, होटल, वीजा, दैनिक भत्ता, किट तथा IOA, राज्य और निजी स्रोतों का खर्च जोड़कर कोई प्रमाणित समेकित अंतिम आंकड़ा अभी सार्वजनिक नहीं है।

सरकार, IOA और खेल महासंघों की क्या उम्मीदें थीं?

सरकार या IOA ने कोई प्रमाणित सार्वजनिक राष्ट्रीय संख्या—जैसे 40 पदक या 15 स्वर्ण—लक्ष्य के रूप में घोषित नहीं की थी। TOPS के CEO का लक्ष्य अधिक व्यावहारिक था: जिन खेलों को कार्यक्रम में रखा गया है, उनमें भारत पिछली बार से बेहतर करे। तुलनीय खेलों में 31 से 39 पदक होने के कारण यह अपेक्षा पूरी हुई। सरकारी तैयारी और अपेक्षा पर रिपोर्ट

  • भारोत्तोलन के मुख्य प्रशिक्षक ने 8 से 10 पदकों की उम्मीद की थी; भारत ने 8 जीते।
  • भारतीय जूडो प्रशिक्षकों को कम-से-कम 6 पदकों की आशा थी; चार मिले।
  • पैरा दल का लक्ष्य 5 से 6 पदक था; खिलाड़ियों ने 7 जीतकर इसे पार किया।
  • अंजू बॉबी जॉर्ज ने पूरे भारतीय दल के लिए लगभग 30 पदकों को व्यावहारिक अनुमान बताया था; भारत ने 39 जीते।

स्वतंत्र पूर्वानुमान भारत को 35 से 45 पदक, 12 से 16 स्वर्ण और शीर्ष चार में रख रहे थे। वास्तविक 39 पदक, 13 स्वर्ण और चौथा स्थान इसी अनुमान के बीच में रहा। पूर्व-गेम्स पदक अनुमान

IOA के लिए ग्लासगो एक प्रशासनिक अभ्यास भी था। अहमदाबाद 2030 की मेजबानी से पहले आयोजन, खेल कूटनीति और सांस्कृतिक प्रस्तुति को समझना महत्वपूर्ण था। इस संदर्भ में SportsNet Intel का IOA और गुजरात प्रतिनिधिमंडल की अंतरराष्ट्रीय बैठक पर लेख भी उपयोगी पृष्ठभूमि देता है। भारतीय ओलंपिक संघ की भूमिका और अधिकार यहां सरल भाषा में समझे जा सकते हैं।

छोटा भारतीय दल और सीमित सपोर्ट स्टाफ

ग्लासगो में वास्तव में 124 भारतीय खिलाड़ी पहुंचे। शुरुआती सरकारी मंजूरी 191 सदस्यों के लिए थी—126 खिलाड़ी, 51 टीम अधिकारी और 14 केंद्रीय चिकित्सा तथा दल अधिकारी। 2022 में घोषित दल में 215 खिलाड़ी और 107 अधिकारी/सहायक सदस्य थे।

इस बार गैर-खिलाड़ियों की संख्या 107 से घटकर 65 हुई, यानी लगभग 39 प्रतिशत कम। लेकिन खिलाड़ियों की संख्या भी लगभग उतनी ही घटी। प्रति खिलाड़ी सहायक स्टाफ का अनुपात 2022 के लगभग 0.50 से 2026 में 0.52 रहा। इसलिए “सपोर्ट स्टाफ का अनुपात बहुत काट दिया गया” कहना सही नहीं है। वास्तविक समस्या संख्या से अधिक सही विशेषज्ञ को सही खिलाड़ी तक पहुंचाने की थी। दल की सरकारी मंजूरी

कुछ छोटे खेलों को अपना फिजियो या विशेषज्ञ सहयोग नहीं मिला। जिम्नास्ट प्रणति नायक ने ग्रेड-दो टखने की चोट के साथ हिस्सा लिया, जबकि महासंघ ने उनके लिए अलग फिजियो प्रस्तावित नहीं किया था। नीरज चोपड़ा के निजी प्रशिक्षक को सरकारी सूची में जगह नहीं मिली और उनका खर्च निजी तौर पर उठाना पड़ता।

सरकार ने निर्वाचित IOA अथवा महासंघ पदाधिकारियों की यात्रा और आवास का खर्च नहीं उठाने तथा प्रत्येक मान्यता-प्राप्त अधिकारी को खिलाड़ियों के लिए उपयोगी होने की शर्त भी रखी। यह खेल दल के साथ गैर-जरूरी आधिकारिक यात्राओं की पुरानी शिकायतों के विरुद्ध स्पष्ट संदेश था।

ग्लासगो कॉमनवेल्थ गेम्स 2026 क्यों अलग थे?

विक्टोरिया के हटने के बाद ग्लासगो ने सीमित समय और बजट में खेलों को बचाया। आयोजन केवल चार मौजूदा स्थलों, लगभग आठ मील के दायरे और £160 मिलियन के बजट पर किया गया। परंपरागत एथलीट विलेज नहीं बनाया गया; भारतीय खिलाड़ी तीन होटलों में ठहरे। छोटी यात्राओं ने कुछ खिलाड़ियों की रिकवरी आसान की, लेकिन सभी खेलों को समान विशेषज्ञ सहयोग उपलब्ध नहीं हो सका। ग्लासगो के संक्षिप्त आयोजन मॉडल में इसका पूरा संदर्भ है।

भारत ने प्रमुख खेल हटाने का औपचारिक विरोध किया था। सरकार को बताया गया कि 10 खेलों का प्रारूप बजट, उपलब्ध स्थलों और लगभग 3,000 खिलाड़ियों की सीमा के कारण अपनाया गया अस्थायी बचाव मॉडल था। उपलब्ध प्रमाण इसे भारत-विरोधी साजिश नहीं, बल्कि कम लागत वाले आपात आयोजन का असमान प्रभाव दिखाते हैं। लोकसभा में दिया गया आधिकारिक उत्तर

भारत और कितने पदक जीत सकता था?

वास्तविक कार्यक्रम के भीतर दो से चार अतिरिक्त पदकों की विश्वसनीय संभावना थी। पोल वॉल्ट में देव मीणा और पैरा-पावरलिफ्टिंग में अशोक चौथे स्थान पर रहे। कुछ जूडो खिलाड़ी कांस्य मुकाबलों तक पहुंचे। भारोत्तोलक अजय बाबू और लवप्रीत सिंह केवल एक-एक किलो से स्वर्ण चूके—इससे कुल पदक नहीं बढ़ता, लेकिन भारत की स्वर्ण संख्या बढ़ सकती थी।

एक सांकेतिक गणना यह है कि यदि बाहर किए गए छह खेलों में भारत 2022 के वही 30 पदक दोहरा देता, तो 39 की जगह कुल 69 पदक हो सकते थे। यह पूर्वानुमान नहीं है; खिलाड़ी, स्पर्धाएं और दूसरे देशों के पदक भी बदलते, इसलिए इससे संभावित रैंक निकालना उचित नहीं होगा।

भारत की अपनी प्रशासनिक विफलताएं भी रहीं। डोपिंग उल्लंघनों के कारण भारोत्तोलन का कोटा कथित रूप से 16 से घटकर 11 हुआ। एक जूडोका सकारात्मक परीक्षण के बाद और तुलिका मान ‘व्हेयरअबाउट्स’ उल्लंघनों के कारण बाहर हुईं। यानी कुछ रास्ते कार्यक्रम ने बंद किए, लेकिन कुछ अवसर भारत ने स्वयं खोए। भारोत्तोलन कोटा और डोपिंग मामला

पदक तालिका में न दिखने वाली भारतीय कहानियां

बेलफास्ट में छूटा मुक्केबाजों का सामान

भारतीय मुक्केबाजी दल के लगभग आधे खिलाड़ियों का प्रशिक्षण सामान और उद्घाटन समारोह की किट बेलफास्ट में छूट गई थी। महिला प्रशिक्षक भी खिलाड़ियों वाले होटल में नहीं थीं। उसी दल ने 10 पदक और रिकॉर्ड सात स्वर्ण जीतकर प्रतियोगिता की कहानी बदल दी। मुक्केबाजी दल के सामान की रिपोर्ट

शर्मिला धनखड़ का स्वर्ण

दो वर्ष की उम्र में पोलियो, फिर घरेलू हिंसा और 34 वर्ष की उम्र में खेल की शुरुआत—शर्मिला ने पैरा शॉटपुट में स्वर्ण जीता। उनकी तैयारी के लिए पति ने नौकरी छोड़ी, कर्ज लिया और मां ने अपनी जमीन का हिस्सा बेचा। यह शायद भारत का सबसे महंगा पदक नहीं था, लेकिन सबसे भारी पदकों में जरूर था। शर्मिला धनखड़ की पूरी कहानी

मक्के के छिलकों से हाई जंप तक

सरवेश कुशारे के पास कभी लैंडिंग मैट नहीं था। उन्होंने मक्के के छिलकों, कपास और पुराने कपड़ों के ढेर पर छलांग लगाना सीखा। ग्लासगो में उन्होंने 2.25 मीटर पार करके ऐतिहासिक रजत जीता; स्वर्ण विजेता की ऊंचाई समान थी, लेकिन सरवेश को अधिक प्रयास लगे। सरवेश कुशारे की यात्रा

सब्जी बेचने वाले परिवार से पहला पदक

पैरा-पावरलिफ्टर झंडू कुमार पोलियो के साथ बिहार के एक सब्जी विक्रेता परिवार में बड़े हुए। कभी व्हीलचेयर के बिना मंडी तक लंबा रास्ता तय किया, कर्ज लेकर ई-रिक्शा खरीदा और अंततः 190 किलो उठाकर कांस्य जीता। झंडू कुमार की संघर्ष कहानी

आखिरी थ्रो और नीरज की सलाह

यशवीर सिंह सातवें स्थान पर थे। अंतिम प्रयास से पहले नीरज चोपड़ा ने उन्हें भाले की दिशा सीधी रखने की छोटी-सी सलाह दी। यशवीर ने 85.41 मीटर का निजी सर्वश्रेष्ठ फेंककर कांस्य जीत लिया; नीरज ने उसी स्पर्धा में रजत पाया। यशवीर के अंतिम थ्रो की कहानी

भारत के प्रदर्शन पर अंतिम फैसला

क्या भारतीय पदक-वृद्धि जायज है? कुल पदकों के आधार पर नहीं—61 से 39 स्पष्ट गिरावट है। लेकिन उपलब्ध और मोटे तौर पर तुलनीय खेलों में 31 से 39 पदक तथा 9 से 13 स्वर्ण वास्तविक सुधार है।

क्या ₹53.09 करोड़ उचित खर्च था? मुक्केबाजी, एथलेटिक्स और भारोत्तोलन के परिणाम इसे बचाव योग्य बनाते हैं। फिर भी पूरे खर्च का अंतिम सार्वजनिक हिसाब और खेलवार प्रदर्शन समीक्षा जरूरी है।

क्या और पदक संभव थे? वास्तविक कार्यक्रम में कुछ अतिरिक्त पदक और अधिक स्वर्ण संभव थे। पूरा खेल कार्यक्रम होता तो संख्या काफी बड़ी हो सकती थी, लेकिन डोपिंग और सहयोग-व्यवस्था की कमियों ने भी अवसर कम किए।

ग्लासगो ने भारत को सुखद लेकिन कठोर संदेश दिया है। देश मुक्केबाजी, भारोत्तोलन, जूडो, पैरा खेलों और एथलेटिक्स में मजबूत हुआ है; लेकिन ऑस्ट्रेलिया और इंग्लैंड जैसी बहु-खेल शक्ति बनने के लिए तैराकी, साइक्लिंग और जिम्नास्टिक्स जैसे दर्जनों पदक देने वाले खेलों में गहराई बनानी होगी।

समग्र निष्कर्ष: कॉमनवेल्थ गेम्स 2026 में भारत का अभियान बदले हुए कार्यक्रम में बेहतर दक्षता दिखाता है, लेकिन तैराकी, साइक्लिंग और जिम्नास्टिक्स में निवेश की जरूरत भी रेखांकित करता है।

कॉमनवेल्थ गेम्स 2026: प्रमुख सवाल और जवाब

कॉमनवेल्थ गेम्स 2026 में भारत ने कितने पदक जीते?

भारत ने कुल 39 पदक जीते—13 स्वर्ण, 17 रजत और 9 कांस्य। भारत अंतिम पदक तालिका में चौथे स्थान पर रहा।

भारत ने तैयारी पर कितना पैसा खर्च किया?

खेल मंत्रालय ने ₹53.09 करोड़ का तैयारी व्यय बताया। यह भारत का पूर्ण यात्रा और आयोजन-संबंधी बिल नहीं है।

2022 की तुलना में भारत के पदक क्यों घटे?

ग्लासगो में केवल 10 खेल थे। कुश्ती, बैडमिंटन, टेबल टेनिस, हॉकी, स्क्वैश और महिला क्रिकेट कार्यक्रम में नहीं थे; भारत ने 2022 में इनसे 30 पदक जीते थे।

क्या ग्लासगो में भारत का प्रदर्शन सफल माना जाएगा?

कुल पदक कम हुए, लेकिन उपलब्ध खेलों में 2022 के मोटे तुलनीय आधार से पदक और स्वर्ण दोनों बढ़े। इसलिए प्रदर्शन को कार्यक्रम-सापेक्ष सफल, पर बहु-खेल गहराई के लिहाज से अधूरा कहा जा सकता है।

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Harpal Singh Flora
हरपाल सिंह फ्लोरा एक वरिष्ठ खेल पत्रकार और SPORTSNET NEWS के स्पोर्ट्स एडिटर हैं, जो भारत में खेल प्रशासन (Sports Governance), नीतियों और खेल तंत्र की गहन और निष्पक्ष रिपोर्टिंग के लिए जाने जाते हैं।उन्हें पत्रकारिता के क्षेत्र में उत्कृष्ट कार्य के लिए Excellence of Journalism Award से सम्मानित किया जा चुका है। इसके साथ ही वे Newspapers Association of India (NAI) में National Organising Secretary के पद पर भी कार्यरत हैं।हरपाल सिंह फ्लोरा का फोकस सिर्फ़ मैच और नतीजों तक सीमित नहीं है, बल्कि वे खेलों के पीछे चल रहे सिस्टम, नीतियों, फेडरेशन की कार्यप्रणाली और खिलाड़ियों के भविष्य से जुड़े महत्वपूर्ण मुद्दों को सामने लाने का काम करते हैं।SPORTSNET NEWS के माध्यम से उनका उद्देश्य खेल पत्रकारिता को एक नई दिशा देना है—जहाँ सिर्फ खबर नहीं, बल्कि समाधान और जवाबदेही की बात हो।Harpal Singh Flora is a senior sports journalist and the Sports Editor at SPORTSNET NEWS, specializing in sports governance, policy analysis, and investigative reporting in Indian sports.He is an Excellence of Journalism Awardee and serves as the National Organising Secretary at the Newspapers Association of India (NAI).His work focuses on uncovering systemic issues in sports administration, ensuring accountability, and bringing forward policy-level discussions beyond match results.

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