तेलंगाना ओलंपिक एसोसिएशन विवाद, निर्वाचक मंडल सत्यापन और IOA की भूमिका का प्रतीकात्मक चित्र
तेलंगाना ओलंपिक एसोसिएशन में सदस्यता, निर्वाचक मंडल और चुनावी विवाद के बीच IOA ने राज्य सरकार से सत्यापन में सहयोग मांगा है।

हैदराबाद/नई दिल्ली। तेलंगाना ओलंपिक एसोसिएशन (TOA) में लंबे समय से चले आ रहे सदस्यता, निर्वाचक मंडल, चुनाव और प्रतिनिधित्व संबंधी विवाद में भारतीय ओलंपिक संघ (IOA) ने तेलंगाना सरकार से सहयोग मांगा है। IOA अध्यक्ष पी. टी. उषा द्वारा भेजे गए पत्र में राज्य सरकार से सदस्यता रिकॉर्ड और निर्वाचक मंडल का सत्यापन कराने तथा आवश्यकता पड़ने पर स्वतंत्र और पारदर्शी चुनावी प्रक्रिया में सहयोग देने का अनुरोध किया गया है।

IOA ने कहा है कि उसे विभिन्न पक्षों से शिकायतें, प्रतिवेदन, आपत्तियां और जवाबी दावे प्राप्त हुए हैं। उसके अनुसार विवाद का समाधान खेल प्रशासन में स्थिरता और खिलाड़ियों के हित में जरूरी है।

हालांकि IOA की इस पहल को विवाद के समाधान की दिशा में कदम माना जा सकता है, लेकिन इसके साथ कई महत्वपूर्ण प्रशासनिक और कानूनी सवाल भी खड़े हो रहे हैं।

तेलंगाना ओलंपिक संघ में विवाद नया नहीं

तेलंगाना ओलंपिक एसोसिएशन में सदस्यता और निर्वाचक मंडल को लेकर विवाद पिछले कई वर्षों से चल रहा है। वर्ष 2024 में प्रस्तावित चुनावों को लेकर कई राज्य खेल संघों ने तेलंगाना हाईकोर्ट का रुख किया था।

याचिकाओं में आरोप लगाया गया था कि कुछ वैध सदस्य संघों को मतदाता सूची से बाहर किया गया, सदस्यता रिकॉर्ड में पारदर्शिता नहीं थी और चुनाव प्रक्रिया उचित तरीके से नहीं चलाई गई। अदालत ने चुनाव प्रक्रिया पर अंतरिम रोक से जुड़े मामलों पर भी सुनवाई की थी।

कुछ याचिकाओं में तत्कालीन पदाधिकारियों के कार्यकाल, वित्तीय रिकॉर्ड, सदस्यता हटाने की प्रक्रिया और प्रशासनिक निर्णयों पर भी सवाल उठाए गए थे। हालांकि इन आरोपों को अंतिम न्यायिक निष्कर्ष नहीं माना जा सकता।

फर्जी लेटरहेड और प्रमाणपत्र जारी करने के आरोप

मार्च 2025 में तेलंगाना ओलंपिक एसोसिएशन के एक पक्ष ने पुलिस में शिकायत देकर आरोप लगाया था कि कुछ व्यक्तियों ने कथित रूप से फर्जी लेटरहेड और अनधिकृत affiliation certificates जारी किए।

इससे स्पष्ट होता है कि विवाद केवल चुनाव तक सीमित नहीं है। इसमें यह भी तय किया जाना बाकी है कि कौन-सा समूह या पदाधिकारी वैधानिक रूप से एसोसिएशन का प्रतिनिधित्व करने का अधिकारी है।

IOA ने सरकार से क्या मांगा?

IOA ने तेलंगाना सरकार से कहा है कि वह:

  • सदस्य संघों के रिकॉर्ड का सत्यापन कराए;
  • उनके पदाधिकारियों और अधिकृत प्रतिनिधियों की पुष्टि करे;
  • आपत्तियां और प्रतिदावे सुने;
  • अंतिम और सत्यापित निर्वाचक मंडल तैयार कराए; और
  • आवश्यकता पड़ने पर स्वतंत्र तथा पारदर्शी चुनावी प्रक्रिया को सुगम बनाए।

IOA ने प्रक्रिया को लगभग 90 दिनों में पूरा करने का सुझाव दिया है। उसने यह भी कहा है कि वह राज्य ओलंपिक संघ की स्वायत्तता में सरकारी हस्तक्षेप नहीं चाहता और सरकार की भूमिका केवल सहयोग तथा सत्यापन तक सीमित रहनी चाहिए।

IOA की प्रक्रिया पर भी सवाल

IOA के कदम का उद्देश्य विवाद का समाधान बताया गया है, लेकिन यह जरूरी है कि स्वयं IOA भी अपनी कार्रवाई की कानूनी और संवैधानिक प्रक्रिया सार्वजनिक करे।

पहला सवाल यह है कि IOA के संविधान और Dispute Commission Rules में सदस्य संस्थाओं के विवादों को आंतरिक विवाद निवारण व्यवस्था के माध्यम से हल करने का प्रावधान है। ऐसे में यह स्पष्ट किया जाना चाहिए कि क्या तेलंगाना विवाद को IOA की Dispute Commission या किसी अन्य सक्षम समिति के सामने रखा गया था।

यदि नहीं, तो सीधे राज्य सरकार से सहयोग मांगने का निर्णय किस आधार और किस अधिकार से लिया गया?

दूसरा प्रश्न यह है कि IOA का पत्र केवल अध्यक्ष के स्तर पर भेजा गया या इसके लिए Executive Council अथवा किसी सक्षम समिति की स्वीकृति भी ली गई।

तीसरा प्रश्न यह है कि सत्यापन की प्रक्रिया कौन करेगा, उसके मानदंड क्या होंगे और विवादित पक्षों को सुनवाई का समान अवसर कैसे मिलेगा।

स्वायत्तता बनाम सरकारी सहयोग

IOA का कहना है कि वह सरकारी हस्तक्षेप नहीं चाहता, लेकिन साथ ही उसने राज्य सरकार को सदस्यता और निर्वाचक मंडल के सत्यापन में महत्वपूर्ण भूमिका देने की बात कही है।

यहीं सबसे बड़ा संवैधानिक प्रश्न पैदा होता है।

यदि राज्य सरकार केवल रिकॉर्ड उपलब्ध कराने और निष्पक्ष अधिकारी नामित करने तक सीमित रहती है, तो इसे facilitative support माना जा सकता है। लेकिन यदि सरकार यह तय करने लगे कि कौन-सा संघ वैध सदस्य है या कौन चुनाव लड़ेगा, तो खेल संस्था की स्वायत्तता प्रभावित हो सकती है।

इसलिए IOA को सरकार की भूमिका और अधिकार-सीमा स्पष्ट करनी होगी।

अदालत में लंबित मामलों का भी ध्यान जरूरी

तेलंगाना ओलंपिक एसोसिएशन के चुनाव और सदस्यता से जुड़े मामले पहले ही हाईकोर्ट तक पहुंच चुके हैं। ऐसे में IOA द्वारा शुरू की जाने वाली कोई भी प्रक्रिया अदालत के आदेशों और लंबित कार्यवाहियों के अनुरूप होनी चाहिए।

यदि न्यायालय में किसी चुनाव, सदस्यता या पदाधिकारी के अधिकार से संबंधित मामला लंबित है, तो IOA या राज्य सरकार द्वारा समानांतर निर्णय आगे नया विवाद पैदा कर सकता है।

सभी पक्षों को सुनना जरूरी

किसी भी समाधान से पहले IOA और राज्य सरकार को तेलंगाना ओलंपिक एसोसिएशन के सभी दावेदार पक्षों, राज्य खेल संघों, जिला इकाइयों और प्रभावित पदाधिकारियों को समान अवसर देना चाहिए।

अंतिम निर्वाचक मंडल तैयार करने से पहले:

  • सदस्यता रिकॉर्ड सार्वजनिक किए जाएं;
  • दावों और आपत्तियों के लिए समय दिया जाए;
  • प्रत्येक निर्णय कारण सहित लिखित रूप में जारी हो;
  • किसी पक्ष को बिना सुनवाई बाहर न किया जाए; और
  • चुनाव स्वतंत्र Returning Officer की निगरानी में हों।

खिलाड़ियों को विवाद का नुकसान न हो

इस विवाद का सबसे बड़ा नुकसान खिलाड़ियों को हो सकता है। यदि राज्य ओलंपिक संघ की मान्यता या प्रतिनिधित्व स्पष्ट नहीं होगा, तो राज्य टीमों, राष्ट्रीय प्रतियोगिताओं, खेल अनुदान और चयन प्रक्रियाओं पर प्रभाव पड़ सकता है।

इसलिए विवाद का समाधान जरूरी है, लेकिन समाधान की प्रक्रिया उतनी ही पारदर्शी, कानूनी और निष्पक्ष होनी चाहिए।

IOA का कदम सही दिशा में साबित होगा या नया विवाद पैदा करेगा, यह इस बात पर निर्भर करेगा कि वह अपनी संवैधानिक प्रक्रिया, निर्णय लेने वाली प्राधिकरण और सत्यापन के मानदंड कितनी स्पष्टता से सार्वजनिक करता है।

IOA के अपने घर में भी फिर उभर रहे सवाल

IOA जब तेलंगाना ओलंपिक एसोसिएशन में पारदर्शिता, वैध सदस्यता और निष्पक्ष चुनाव की बात कर रहा है, तब उसके अपने प्रशासन और हालिया निर्णयों पर भी गंभीर प्रश्न उठ रहे हैं।

हाल ही में IOA ने Karate India Organisation (KIO) को पत्र लिखकर उसके नाम में “India” शब्द के कथित अनधिकृत उपयोग, राष्ट्रीय चैंपियनशिप के आयोजन और भारतीय टीम के चयन पर आपत्ति जताई। IOA का कहना था कि KIO को भारत सरकार से राष्ट्रीय खेल महासंघ के रूप में मान्यता प्राप्त नहीं है और इसलिए उसे इस प्रकार के अधिकारों का दावा नहीं करना चाहिए।

लेकिन यहां एक स्वाभाविक सवाल उठता है—क्या यही मानक देश में सक्रिय अन्य सभी गैर-मान्यता प्राप्त खेल संगठनों पर समान रूप से लागू किया गया है?

खेल जगत में कई ऐसे संगठन सक्रिय हैं जिनके नाम में “India”, “Indian” या “Bharat” शब्द का प्रयोग होता है, जबकि उन्हें केंद्र सरकार से राष्ट्रीय खेल महासंघ की मान्यता प्राप्त नहीं है। ऐसे में केवल KIO को सार्वजनिक रूप से निशाना बनाए जाने से चयनात्मक कार्रवाई की आशंका पैदा होती है। IOA को स्पष्ट करना चाहिए कि उसने कितने अन्य ऐसे संगठनों को नोटिस जारी किए और KIO के मामले को अलग तरीके से क्यों लिया गया।

स्की एवं स्नोबोर्ड विवाद ने बढ़ाई IOA की मुश्किलें

IOA की कार्यप्रणाली पर हालिया सवाल स्की एवं स्नोबोर्ड विवाद के बाद और गंभीर हो गए हैं।

दिल्ली हाईकोर्ट ने पूर्व में स्पष्ट किया था कि IOA द्वारा गठित ad hoc committee को किसी नई राष्ट्रीय खेल संस्था के गठन का अधिकार नहीं दिया गया था। अदालत ने माना था कि नई संस्था के गठन से संबंधित कार्रवाई ad hoc committee को दिए गए अधिकार क्षेत्र से बाहर थी।

इसके बावजूद जून 2026 में International Ski and Snowboard Federation (FIS) ने नवगठित Bhartiya Ski and Snowboard Association को भारत की सदस्य संस्था के रूप में मान्यता दे दी और Ski and Snowboard India की सदस्यता समाप्त कर दी।

इस घटनाक्रम के बाद यह आरोप सामने आया है कि FIS को IOA की ओर से एक पत्र भेजा गया था, जिसने नई संस्था के दावे को समर्थन दिया। हालांकि IOA ने अभी तक सार्वजनिक रूप से यह स्पष्ट नहीं किया है कि:

  • वह पत्र किसने तैयार किया;
  • किस वैधानिक अधिकार से भेजा गया;
  • क्या IOA Executive Council ने उसे मंजूरी दी;
  • क्या मामले पर किसी सक्षम समिति या वैधानिक बैठक में चर्चा हुई; और
  • क्या संबंधित सभी पक्षों को सुनवाई का अवसर दिया गया।

यह भी दावा किया जा रहा है कि पत्र IOA कार्यालय की नियमित आधिकारिक प्रक्रिया से न भेजकर अध्यक्ष की ईमेल आईडी से भेजा गया। इस दावे की स्वतंत्र आधिकारिक पुष्टि अभी उपलब्ध नहीं है, लेकिन FIS की बैठक से सामने आए वीडियो और वक्तव्यों ने मामले को सार्वजनिक बहस में ला दिया है।

यदि पत्र वास्तव में IOA की ओर से भेजा गया था, तो IOA को उसकी प्रति, सक्षम प्राधिकारी की स्वीकृति और उससे संबंधित बैठक के मिनट्स सार्वजनिक करने चाहिए।

प्रतिनिधित्व करने वाले व्यक्ति पर भी उठे प्रश्न

FIS General Assembly में भारत का प्रतिनिधित्व करने वाले रूप चंद नेगी की भूमिका को लेकर भी सवाल उठाए जा रहे हैं। कुछ पक्षों ने उनके विरुद्ध हिमाचल प्रदेश में कानूनी मामलों या शिकायतों का दावा किया है।

हालांकि किसी व्यक्ति के विरुद्ध मामला दर्ज होना अपने-आप में दोष सिद्धि नहीं होता। इसलिए IOA या संबंधित संस्था को स्पष्ट करना चाहिए कि प्रतिनिधि की पात्रता, प्राधिकरण और पृष्ठभूमि की जांच किस प्रक्रिया से की गई थी।

बिना प्रमाणित न्यायिक रिकॉर्ड के किसी आपराधिक आरोप को अंतिम तथ्य के रूप में प्रस्तुत करना उचित नहीं होगा।

Sportsnet News के सवालों पर IOA की चुप्पी

Sportsnet News ने इस पूरे प्रकरण को लेकर IOA अध्यक्ष पी. टी. उषा, CEO और Executive Council के सदस्यों को पत्र भेजकर कई प्रश्न पूछे हैं।

इनमें प्रमुख सवाल थे:

  • FIS को पत्र किसने लिखा;
  • पत्र भेजने की मंजूरी किसने दी;
  • क्या Executive Council को इसकी जानकारी थी;
  • क्या किसी वैधानिक बैठक में इस विषय पर चर्चा हुई;
  • नई संस्था को समर्थन देने का आधार क्या था; और
  • दिल्ली हाईकोर्ट के आदेश के बावजूद यह प्रक्रिया किस अधिकार से आगे बढ़ी।

समाचार लिखे जाने तक IOA अध्यक्ष, CEO या कार्यकारिणी सदस्यों की ओर से इन प्रश्नों का कोई जवाब प्राप्त नहीं हुआ था।

IOA की यह चुप्पी संदेहों को समाप्त करने के बजाय उन्हें और बढ़ाती है।

IOA में मतभेद फिर सामने आने के संकेत

IOA अध्यक्ष पी. टी. उषा और Executive Council के कई सदस्यों के बीच पहले भी CEO की नियुक्ति, समितियों के गठन, अधिकारों के उपयोग और निर्णय लेने की प्रक्रिया को लेकर गंभीर मतभेद सामने आ चुके हैं।

स्की एवं स्नोबोर्ड मामले में भी यदि यह साबित होता है कि महत्वपूर्ण पत्र या निर्णय कार्यकारिणी की जानकारी और अनुमोदन के बिना लिए गए, तो यह IOA के भीतर संस्थागत मतभेदों और केंद्रीकृत निर्णय प्रक्रिया की ओर संकेत करेगा।

इसलिए तेलंगाना ओलंपिक एसोसिएशन को पारदर्शिता का पाठ पढ़ाने से पहले IOA को अपने निर्णयों, पत्राचार, अनुमोदन प्रक्रिया और कार्यकारिणी की भूमिका पर भी पूरी स्पष्टता देनी होगी।

सवाल केवल यह नहीं है कि तेलंगाना में कौन सही है। बड़ा सवाल यह भी है कि IOA स्वयं जिन मानकों की अपेक्षा दूसरों से कर रहा है, क्या वह उन्हें अपने प्रशासन में समान रूप से लागू कर रहा है?

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